Chapter 29
जगत के शासन करय के इच्छा
मूल
故物或行或随,或嘘或吹,或强或羸,或挫或隳。
是以圣人去甚,去奢,去泰。
अनुवाद
गहन चिंतन
ई अध्याय की बारे में बा?
ई अध्याय कहै छै जे जगत के नियंत्रित करय के प्रयास व्यर्थ अछि। जगत एक पवित्र उपकरण अछि, जकरा कृत्रिम रूप सं नैं बदलल जा सकै। जे कोनो जोर जमायै छै ओकर विपरीत प्रभाव पड़ै छै। प्रकृति में सभ कुछ परस्पर पूरक अछि - किछु आगू चलै छै, किछु पाछू; किछु गर्म अछि, किछु ठंडा। ई संतुलन के प्रकृति स्वयं बनाबै छै।
एहि कें हमरा सँ की संबंध?
हम सभ अपन जीवन में नियंत्रण चाहै छी - अपन बाल-बच्चा के, अपन कार्य के, अपन परिवार के। परंतु जब हम जोर जमायै छी तँ सभ किछु बिगाड़ि जायै छै। हमर अत्यधिक इच्छा आओर महत्वकांक्षा हमरा दूर ले जायै छै। शांति तखन मिलै छै जब हम सहज रूप सं प्रवाह में रहै छी।
आइ हम की करी?
आज अपन किछु नियंत्रित करय के इच्छा पर नियंत्रण राखू। जे चीज अहाँ के नियंत्रण में नैं अछि, ओकरा स्वीकार करू। कोनो एक क्षेत्र में कम आग्रह राखू आओर देखू जे अहाँ के जीवन में कतेक शांति आबै छै।
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मम विचार
एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?