Chapter 64
जे शांत अछि, ओकरा सम्हारि पड़ए
मूल
合抱之木,生于毫末;九层之台,起于累土;千里之行,始于足下。
为者败之,执者失之。是以圣人无为故无败,无执故无失。
民之从事,常于几成而败之。慎终如始,则无败事。
是以圣人欲不欲,不贵难得之货;学不学,复众人之所过。以辅万物之自然而不敢为。
अनुवाद
गहन चिंतन
ई अध्याय की बारे में बा?
एहि अध्यायमे कहल गेल अछि जे सरल बातकें शुरुआतमे पकड़ब अछि त रखब। जदि कोनो काजकें पहिने सँ ही सँभालल जाए त एकदम कठिन नै होए। एकटा विशाल वृक्ष, एकटा ऊँच राजमाटि, आउर एकटा लंब यात्रा सब छोट-छोट शुरुआत सँ होए छै। जे लालसा रखै छथि ओ नैश हुए जानै छथि, जे बहुत हाथ-पाँव मरै छथि ओकरा गुआए दै छथि।
एहि कें हमरा सँ की संबंध?
हम अक्सर कोनो काम बहुत बड़ा भऽ जाए पर बनावै छिऊ, ततै बिगड़ि जाए छै। अउर ओहि समय कहै छिऊ जे 'हो जाएत'। मोहनार लेल एहि अध्यायकें सीख अछि जे कोनो कामकें पहिने सँ ही, जदि ओ छोट अछि त, सँभालब आउर व्यवस्थित करब।
आइ हम की करी?
आज अपन किस्तो अधूर काजकें देखू आउर जे सबसँ छोट काम सँ शुरू करू। कोनो एकटा बात जे बहुत दिन सँ टल रहल अछि ओकरा आज एहि क्रम सँ करब जे अंतमे ओकरा गुरूर नै होए।
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मम विचार
एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?