Chapter 63

निर्विकारक कार्य करू

为无为,事无事,味无味。大小多少,报怨以德。
图难于其易,为大于其细。天下难事必作于易,天下大事必作于细。
是以圣人终不为大,故能成其大。夫轻诺必寡信,多易必多难。是以圣人犹难之,故终无难矣。
निर्विकार रूपसँ कार्य करू, विश्रामसँ विश्राम करू, स्वादहीन स्वाद चाखू। बड़का कमसँ आओर कम बड़ासँ मिलाबू। दुःखके गुण दानसँ प्रतिपाद करू। कठिन कार्यके सहज कार्यमे सुधारू, बड़का कार्यके छोट कार्यसँ आरंभ करू। संसारक कठिन कार्य सहजसँ उत्पन्न होइछै, बड़का कार्य छोटसँ। एहिकारण साधु अंततः बड़ा नहि करैछै, एहिसँ ओ बड़ा बनैछै। जे सहजसँ वचन दियैछै ओ विश्वास नहि राखैछै, जे बहुत सहज मानैछै ओ बहुत कठिन भावैछै। एहिकारण साधु कठिन कार्यके बहुत कठिन मानैछै, एहिसँ ओ कखनो कठिन नहि भावैछै।

गहन चिंतन

ई अध्याय की बारे में बा?

ई अध्याय कहैछै जे सब कार्य निर्विकार रूपसँ करबाक चाहीं। कठिन कार्यके छोट-छोट भागमे बांटू, दुःखके प्रति गुण दानसव प्रतिक्रिया दियू। जे सहजसँ किछु करबाक कहैछै, तकर बहुत कम विश्वास करू।

एहि कें हमरा सँ की संबंध?

मोर जीवनमे मैं बहुत कार्य एकसाथ करबाक चाहैछिह, मुदा ई अध्याय कहैछै जे धीरे-धीरे आओर सहजसँ आगु बढ़ू।

आइ हम की करी?

आज मैं कोनो एक कार्यके सरल भागसँ आरंभ करब आओर ओकरा पूर्ण करबाक बिनु अन्य नहि करब।

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मम विचार

एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?

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