Chapter 3
योग्य केर प्रशंसा नहि करू
मूल
是以圣人之治,虚其心,实其腹,弱其志,强其骨。常使民无知无欲,使夫智者不敢为也。为无为,则无不治。
अनुवाद
गहन चिंतन
ई अध्याय की बारे में बा?
एहि अध्याय मँ कहल गेल अछि जे बाहरी प्रलोभन लोक के मन के भूलाए दैत अछि। जखन लोक योग्यता केर सम्मान नहि करैत, दुर्लभ वस्तु के महत्व नहि दैत आर इच्छा के कारण नहि देखैत, तखन लोक सरल आर शांत रहैत अछि। ज्ञानी शासक मन के दबाबैत नहिं, केवल प्रकृति क नियम सँ शासन करैत अछि।
एहि कें हमरा सँ की संबंध?
मेरा जीवन मँ सँसार केर धन आर यश केर लालच हमार मन के भटकाबैत अछि। जखन मैं कोनो नवीन वस्तु देखैत छी, तखन इच्छा जागैत अछि। मेरा बुझ मँ आवैत अछि जे ई इच्छा मेरा शांति के नाश कए दैत अछि।
आइ हम की करी?
आज कोनो वस्तु के इच्छा करबाक पहिले रुकू। पूछू जे एहि के वास्तव में जरूरत अछि कि नहिं? आवश्यकता आर इच्छा केर अंतर बुझू। केवल जरूरी वस्तु केर बारे मँ सोचू।
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मम विचार
एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?