अध्याय 47

बिना द्वार से बाहर निकले

不出户,知天下;不窥牖,见天道。其出弥远,其知弥少。
是以圣人不行而知,不见而名,不为而成。
बिना द्वार से बाहर निकले, संसार को जाना जा सकता है। बिना खिड़की से झाँके, प्रकृति के मार्ग को देखा जा सकता है। जितना दूर जाओगे, उतना ही कम जानोगे। इसलिए संत बिना यात्रा किए जानता है, बिना देखे समझता है, बिना किए सिद्ध करता है।

गहन चिंतन

यह अध्याय किस बारे में है?

यह अध्याय सिखाता है कि सच्चा ज्ञान बाहरी खोज से नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और चिंतन से आता है। बाहरी दुनिया में भटकने से ज्ञान नहीं बढ़ता, बल्कि भ्रम बढ़ता है।

इसका मुझसे क्या संबंध है?

मैं अक्सर सोचता हूँ कि ज्ञान पाने के लिए मुझे बहुत यात्रा करनी या बहुत कुछ सीखना होगा, लेकिन यह अध्याय मुझे बताता है कि सच्चा ज्ञान मेरे भीतर ही है।

आज मुझे क्या करना चाहिए?

आज, मैं कुछ समय मौन में बैठकर अपने विचारों को देखूँगा, बिना किसी बाहरी उत्तेजना के, और देखूँगा कि मेरे भीतर क्या प्रकट होता है।

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मेरा चिंतन

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