अध्याय 46
संसार में धर्म हो तो
मूल
天下有道,却走马以粪。天下无道,戎马生于郊。
祸莫大于不知足,咎莫大于欲得。故知足之足,常足矣。
祸莫大于不知足,咎莫大于欲得。故知足之足,常足矣。
अनुवाद
जब संसार में धर्म होता है, तो युद्ध के घोड़े खेतों में हल खींचते हैं। जब संसार में अधर्म होता है, तो युद्ध के घोड़े सीमाओं पर जन्म लेते हैं। असंतोष से बड़ा कोई दोष नहीं, लालच से बड़ा कोई पाप नहीं। इसलिए जो संतोष में संतोष पाता है, वह सदा संतुष्ट रहता है।
गहन चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
यह अध्याय बताता है कि जब समाज में धर्म और शांति होती है, तो हिंसा के साधन भी शांति के काम आते हैं। असंतोष और लालच ही सबसे बड़े दुखों के कारण हैं। सच्चा सुख संतोष में है, बाहरी वस्तुओं के संग्रह में नहीं।
इसका मुझसे क्या संबंध है?
मैं अक्सर और अधिक पाने की इच्छा में भटक जाता हूँ। यह अध्याय मुझे याद दिलाता है कि मेरी असली शांति संतोष में है, न कि बाहरी सफलता या संपत्ति में।
आज मुझे क्या करना चाहिए?
आज, मैं एक ऐसी चीज़ की सराहना करूँगा जो मेरे पास पहले से है, जिसे मैं अक्सर अनदेखा कर देता हूँ, और उसके लिए आभार व्यक्त करूँगा।
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मेरा चिंतन
यह अध्याय आपको क्या प्रेरणा देता है? आप इसे कैसे लागू करेंगे?