अध्याय 49

संत के ना होला स्थिर मन

圣人无常心,以百姓心为心。
善者,吾善之;不善者,吾亦善之,德善。
信者,吾信之;不信者,吾亦信之,德信。
圣人在天下,歙歙为天下浑其心。百姓皆注其耳目,圣人皆孩之。
संत के मन में स्थिर बिचार ना होला, ऊ जे जन के मन होखे, अपना मन में वही धर लेला। जे अच्छा बा, ओकरा के अपना अच्छाई से मिलावेला; जे अच्छा ना बा, ओकरा केहू केहू अउरी मिलावेला, एहि से अच्छाई के कमाई होला। जे विश्वास के योग्य बा, ओकरा के विश्वास देवेला; जे विश्वास के योग्य ना बा, ओकरा केहू केहू विश्वास देवेला, एहि से विश्वास के कमाई होला। दुनिया में संत बा, त ऊ अपना मन के दुनिया भर के मन जइसन बना देला। लोग अपना कान आउर आँखि से संत के देखत-सुनत बा, आ संत ओकरा के बच्चा जइसन मान लेला।

गहन चिंतन

एहि अध्याय में का बात होला?

ई अध्याय बतावेला कि संत अपना मन के कवना तरह से बदलत बा। ऊ कवना तरह के लोग के सामना करी, सभ के एक समान नजरिये से देखत बा। संत के मन स्थिर ना होला, बलुक ऊ जनता के भावना अनुसार बदलत जाला।

एहि के मोहल्ला से का संबंध?

हमार जिनगी में ई बतावेला कि हर व्यक्ति के अलग-अलग सोच होला। जब हम सभ के एक समान आँखि से देखब, त हमार मन में कड़वाहट ना रही। ई शिक्षा हमका के नम्र रहे के सीख देवेला।

आज का करब?

आज हम कोनो एक व्यक्ति के बिचार सुनब जेकर साथ हमार मतभेद बा, आ ओकरा के बिना कोनो पूर्वाग्रह के सुनब।

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मोहना विचार

एहि अध्याय में रउआ के का प्रेरित करेला? रउआ एकरा केसे लागू करब?

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