अध्याय 28
नर नारी की टेक - जानि अकिञ्चन
Original
知其白,守其黑,为天下式。为天下式,常德不忒,复归于无极。
知其荣,守其辱,为天下谷。为天下谷,常德乃足,复归于朴。
朴散则为器,圣人用之则为官长。故大制不割。
अनुवाद
गहरा चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
जा चapter में कहा गइल कि जौन पुरुष पुरुष जानई ले कि नारी सहज सीतल बासी होई ले, ओहकर बल कम ना होई ले बल्कि बढ़ि जाई ले। जैसे गिरि में बहत हुइला नदी, ओह में सब तरह की जल आवई ले बिना कुछ बोले, बिना कुछ माँगे। जौन जानई ले कि उजियरा कहाँ होई ले बाँई अँधेरा कहाँ होई ले, ओकर हिय में सबल सूझ बासी होई ले। जौन जानई ले कि सम्मान कहाँ से आवई ले बाँई अपमान कहाँ से आवई ले, ओकर मति में कोमलता बासी होई ले। यह सब जानि के बाद जौन सरल अकिञ्चन बन जाई ले, ओकर बल सब तरह काम आवई ले।
यह मुझसे कैसे संबंधित है?
हम अपने जीव में सबले बेसी अपनी ताकत बानने की कोशिश करत बानी जा। जब कि ई chapter हमें सिखावई ले कि सच्चा बल निचलाई स्वीकार करे में बा। जब हम कमजोरी दिखावई जा, नरम बानी जा, तब हमार बल कम ना होई ले बल्कि बढ़ि जाई ले। हम में से हर एक के मन में अकिञ्चन सरलता बा, जेवन हम भूलि गइल बानी जा।
आज मुझे क्या करना चाहिए?
आज हम अपने मन में ई बिचार करी जा कि हम कहाँ पर अपनी ताकत लउकावे की कोशिश करत बानी जा जब कि ओह जगह हम नरम हुइला से बेसी फायदा पावी जा। हम अपने काम में नरम बानी जा के कोशिश करी जा, दूसरन की बात में अपन कहना घटावे की कोशिश करी जा, आर सरल सरल रहे की चेष्टा करी जा।
संबंधित अध्याय
मेरा चिंतन
What does this chapter inspire in you? How will you apply it?