Chapter 7
आकाश आ धरती अनन्त रहैछ
मूल
是以圣人后其身而身先,外其身而身存。非以其无私邪?故能成其私。
अनुवाद
गहन चिंतन
ई अध्याय की बारे में बा?
ई अध्याय कहैछ जे आकाश आ धरती तरकालधरि रहैछ कारण ओ अपनऽ लेली नहि जीवैछनि, सबहक लेली दान करैछनि। जे मनुख सेहो अपनऽ पिछरि होइछ, दोसरक केँ आगु राखैछ, ओहि कें बड़ भाग्य मिलैछ। जे अहारहि नहि अछि, अपनऽ लालच नहि राखैछ, ओ निश्चय ही सफल जीवन बिताइछ।
एहि कें हमरा सँ की संबंध?
मैं हमेशा अपनऽ बात केँ पिछरि राखैत छई। मोर मन अछि जे पहिले मैं अपनऽ परिवार आ मित्रक केँ सुख पहुँचावऽ, तऽ प्रभु मोकँ सेहो अछि देबऽ। जँ मैं सेहो अहारहि सोचऽ जाइछऽ, तऽ मोर जीवन अछि जे ओहि तरहक दान नहि कए रहऽ जाइछ, कारण आकाश आ धरती अछि जे अपनऽ लेली नहि जीवैछनि।
आइ हम की करी?
आजि मैं कोनो एकटा काज अपनऽ लेली नहि, बलुक दोसरक केँ सुख पहुँचावब लेली करऽ। एहि में मैं प्रभु कें प्रसन्न कए सकऽ छई। हो सकैछ जे मोर कोनो सहयोगी या पड़ोसी केँ कोनो छोट काज में मदद करऽ।
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मम विचार
एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?