अध्याय 58
धीमर राज और सुखी प्रजा
Original
其政闷闷,其民淳淳;其政察察,其民缺缺。
祸兮福之所倚,福兮祸之所伏。孰知其极?其无正。正复为奇,善复为妖。人之迷,其日固久。
是以圣人方而不割,廉而不刿,直而不肆,光而不耀。
祸兮福之所倚,福兮祸之所伏。孰知其极?其无正。正复为奇,善复为妖。人之迷,其日固久。
是以圣人方而不割,廉而不刿,直而不肆,光而不耀。
अनुवाद
जब राजा धीमा होवै, तब प्रजा सुखी।\nजब राजा तीक्षण होवै, तब प्रजा दुखी।\nभाग में विपत्ति लगी है, विपत्ति में भाग।\nई कौन समुझे बड़े, कोई नाहिंन लाग।\nनेकी में अधमता है, अधमता में नेक।\nमनुष्य मोह में पड़ा, बहुत दिनसे एक।\nसंत ज्ञानी बनिक होवै, कटु नाहिंन काट।\nसीधा बनिक होवै, पर दूसरन न साट।\nउजियालो बनिक होवै, पर चमक न सोच।\nएही में राज मिलै, बड़ा पावे कोच।
गहरा चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
ई अध्याय बतावै साधु कि जब राजा धीमा और कोमल होवै तब प्रजा के सुख। जब राजा कड़ा और तीक्षण होवै तब प्रजा के दुख। भाग में दुख और दुख में भाग छुपल रहे बाड़े। ई माया के खेल हवै जे सब नाहिंन समुझे। संत ज्ञानी बनिक होवै पर अलग नाहिंन काटे, सीधा बनिक होवै पर दूसरन के क्षति नाहिंन करे, उजियाला बनिक होवै पर चमक न दिखावे।
यह मुझसे कैसे संबंधित है?
हमार जीव में भी बरताव के दो रास्ता हवै। कभी कड़ा हवैं, कभी कोमल। जब मैं दूसरन से बहुत सख्त होईं, तब संबंध खराब हो जाहिं। जब धीमा और सहनशील होईं, तब सुख मिले। भाग और विपत्ति में भी अपन अनुभव हवै - कई बार बुराई में भी भलाई निकले बाड़ी।
संबंधित अध्याय
मेरा चिंतन
What does this chapter inspire in you? How will you apply it?