अध्याय 3

बड़ लोगन के ना चाहीं

不尚贤,使民不争;不贵难得之货,使民不为盗;不见可欲,使民心不乱。
是以圣人之治,虚其心,实其腹,弱其志,强其骨。常使民无知无欲,使夫智者不敢为也。为无为,则无不治。
बड़ लोगन के ना चाहीं, तऽऽ लोग झगड़ा ना करिहीं; दुर्लभ बस्तु के कीमती ना बनावल जाय, तऽऽ लोग चोरी ना करिहीं; जे मन के भटकावे ओहके ना देखावल जाय, तऽऽ लोग के मन शांत रही। एही से संत लोग के शासन में लोगन के मन के खाली कर दिहल जाला, पेट भर दिहल जाला, इच्छा कम कर दिहल जाला, हड्डी मज़बूत कर दिहल जाला। लोगन के बिना जाने के आ बिना चाहले के रखल जाला, तऽऽ जो मनमानी करे वाला बा ओहो हिम्मत ना कर पावेला। जे कुछ ना करेला ओह कर देला।

गहरा चिंतन

यह अध्याय किस बारे में है?

ई अध्याय सरल शासन के बारे में बा। जब बड़प्पन के ना चाहीं, तऽऽ लोग लड़ाई ना करिहीं। जब दुर्लभ बस्तु के कीमती ना बनावल जाय, तऽऽ चोरी ना होई। जब लोगन के मन में वासना ना जगावल जाय, तऽऽ मन शांत रही। संत लोग लोगन के मन के वासना से खाली करेला, पेट भरेला, ताकत देवेला। बिना लालच आ बिना डर के लोग हिम्मत ना कर पावेला कवनो गलत काम करे के।

यह मुझसे कैसे संबंधित है?

हम अक्सर देखत बानी कि समाज में बड़प्पन के स्टेटस बन गइल बा, दुर्लभ बस्तु के शान बन गइल बा, आ लोग इच्छा के पीछे भागत बा। पर ई अध्याय मुझे सिखावेला कि बाहर के चीज़न में भागल से अंदर के शांति ना मिलेला। जब तक मन में वासना बा, तब तक अशांति बा।

आज मुझे क्या करना चाहिए?

आज अपने मन में चलत बड़प्पन या कीमती बस्तु की चाह के बारे में सोचल जाय। जब कवनो ऐसन चीज़ के मन चाहे जे बाहर से मिलेला, तऽऽ रुक के सोचल जाय कि ई सच्चा खुशी बा कि ना। अपने पेट भरल आ शांति से रहल जाय।

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मेरा चिंतन

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