अध्याय 16

आत्मा के ध्यान के अंतिम सीमा

致虚极,守静笃。万物并作,吾以观复。
夫物芸芸,各复归其根。归根曰静,是谓复命。复命曰常,知常曰明。不知常,妄作凶。
知常容,容乃公,公乃王,王乃天,天乃道,道乃久,没身不殆。
मन के खालीपन के चरम अंत तक ले जाबो, गहिरा शांत भाव में रहबो। जब सब जड़-चेतन चीज़ प्रकृति के रास्ता पे बढ़त बा, हमनी के देखत बानी जा कि सब कुछ फिर से अपना जड़ में लौट जाला। सब अनेक जीव-जंतु, बनस्पति आरू बस्तु मिल के अपना मूल स्रोत में फिर सों जात बाड़न। जड़ में लौट के रुक जाबो ई शांति बा, अवीर्णा नूर में प्रवेश बा। प्रवेश करब मतलब सदा के रास्ता पे होला, आ ई रास्ता जानब मतलब चंचल मन के शांति पावब। जे अवीर्णा नूर के रास्ता नाहीं जानत, ओकर काम अंधेरे में चलत बा आरू हानि पावत बा। जे चिरकालीन सत्य के बात जानत, ओकर मन बड़ा आरू गहिरा हो जाला। जे बड़ा आरू गहिरा हो जाला, ओकर व्यवहार न्यायप्रिय हो जाला। जे न्यायप्रिय हो जाला, ओकरा के राज्य मिल जाला। जे राज्य पावत बा, ओकरा के स्वर्गीय शक्ति मिल जाला। जे स्वर्गीय शक्ति पावत बा, ओकरा के ताओ मिल जाला। जे ताओ पावत बा, ओकर जीवन अनंत हो जाला आरू मृत्यु के भय नाहीं रहत।

गहरा चिंतन

यह अध्याय किस बारे में है?

ई अध्याय कहेला कि मन के खालीपन आरू शांति में रहबो, त पता चलेला कि सब जीव अपना मूल में लौट जात बा। प्रकृति के चक्र में सब कुछ बदलत बा मुड़ के फिर सों अपना स्रोत में आ जात बा। ई चक्र जानबो मतलब सत्य के जानबो, आरू सत्य जानबो मतलब आत्मज्ञान पावबो।

यह मुझसे कैसे संबंधित है?

मई भीतर के व्यस्तता आरू चिंता से बाहर निकल के देखत बानी जा कि मेरा जीवन में जो हो रहल बा, ओकरा के शांत भाव से देखबो जरूरी बा। मेरा के समझ में आवत बा कि मेरे दुख आरू सुख दोनों क्षणिक बा आरू सब कुछ अपना समय पे बदल जात बा। जब मई बाहर के दौड़ में नाहीं भागत, त मईतर के शांति महसूस करत बानी जा।

आज मुझे क्या करना चाहिए?

आज हर घंटा में दू क्षण के ले के आँखि बंद कर के अंदर के शांति के अनुभव करबो। कोई भी बाहरी बात के नाहीं सोचबो, खाली साँस के आवाज सुनबो आरू मन के कहबो कि सब कुछ अपना रास्ता पे बह रहल बा।

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मेरा चिंतन

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