Chapter 80
छोटो राज्य, थोड़ी प्रजा
Original
虽有舟舆,无所乘之;虽有甲兵,无所陈之。使民复结绳而用之。
甘其食,美其服,安其居,乐其俗。邻国相望,鸡犬之声相闻,民至老死,不相往来。
अनुवाद
गहरो विचार
इ अध्याय किण बारे में है?
छोटो राज्य, थोड़ी प्रजा - ई सपना हुई कि जे बड़ो राज्य होय मगर वांमें कोय नाय रहे। जे दस-बीस गुना तरह के हथियार-औजार होंय, त भी वजाय नाय। लोग जान बचाय के राखे, कोय दूर नाय जाय। नाव-रथ होंय तो भी नाय चढ़े, हथियार होंय तो भी नाय लड़े। लोग आपस में बात गांठन बांध के करे। खाणो-पीणो में आनंद होंय, बस्ता-लिबास में शोभा होंय, घर में राहत होंय, रीत-रिवाज में रस होंय। पड़ोसी दूर तक देखे जाय, कुटुंब के कौवा बोले जाय, मगर बूढ़े हुई कुदरत में मिलणो नाय।
इ म्हारे सूं केड़ो संबंधित है?
आजकल हम बड़ैरा-बड़ैरा चीज मांगे रेहैं, मगर सच में सुख नाय मिले। बड़ो मकान होय, मगर राहत नाय; बड़ी गाड़ी होय, मगर सुकून नाय; बड़ा पैसा होय, मगर शांति नाय। ई अध्याय सिखायो कि थोड़ो में संतोष हुआ। आज हम जे करते रेहैं, सब तरह से बड़ैरा हुआ - बड़ी चाहत, बड़ी उम्मीद, बड़ी आस। मगर बस छोटो-छोटो में खुशी हुई।
आज म्हैं के करणो चाहीजे?
आज थोड़ा-थोड़ा करके सब चीज उठायो, बस जेतनो जरूरत होंय उतना ही राखे। किसी चीज की इच्छा होय त पहले सोचे कि जरूरत कितनी हुई, फेर ले। महंगी चीज की जगह सादा खाना खायो, सादा कपड़ा पहिनो, सादा घर में रहो। बस ई सोच के कि पहले के लोग सादगी में खुश रेहैं।
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म्हारो विचार
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